Saturday, 30 August 2014

विशेष बच्चों की आशाकिरण ‘वैशिष्ट्यम्’

उपनिषद् का वाक्य है कि पूर्ण से मात्र पूर्ण ही उत्पन्न हो सकता है। अतः इस सृष्टि में जो भी है वह पूर्ण श्रेष्ठ उत्तम है। उसमें किसी भी प्रकार की कमी त्रुटि देखना एक दृष्टिकोण हो सकता है लेकिन वास्तविकता नहीं। जन्म मरण इस संसार चक्र की धुरी है जो इस सृष्टि को निरंतर गतिमान रखती है। इस संसार में जिसने भी जन्म लिया वह उत्तम है। किन्तु कई बार देखा गया है कि कुछ बच्चे जन्म से ही किसी मानसिक शारीरिक विकलांगता के शिकार होते हैं। उनका जीवन पूर्णरूपेण पराधीन होता है। मैं समझती हूँ कि परमात्मा की बनाई हर रचना उत्तम है चाहे वह शारीरिक या मानसिक रूप से कुछ अपूर्णता ही लिए क्यों हो। जहाँ परमात्मा ने कुछ कमी की है उसके बदले वहाँ किसी अन्य विशेषता के साथ उसकी पूर्ति भी वह स्वयं ही करता है। इस प्रकार से विकलांग बच्चों को परमात्मा का विशिष्ट आशीर्वाद किसी किसी विशिष्ट गुण के रूप में मिलता है, आवश्यकता है उन्हें एक ऐसा वातावरण देने की जहाँ उनके उस विशिष्ट गुण को नई दिशा मिले, परिणामतः वे संसार में सम्मान स्वाभिमान के साथ अपना जीवनयापन कर सकें। ऐसा कर सकना समाज के प्रत्येक समर्थ नागरिक के लिए एक चुनौतीपूर्ण कर्तव्य है

वात्सल्य ग्राम, वृंदावन का पालनाघर आरंभ करने के दिन से ही हमारा यह अनुभव रहा है कि यहाँ माता-पिता अपनी जन्मजात मानसिक या शारीरिक विकलांग संतानों को छोड़ जाते हैं। इस विकलांगता का वैज्ञानिक कारण चाहे जो भी रहा हो लेकिन मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकती हूँ कि यदि ऐसा कोई बच्चा किसी परिवार में आया है तो उसे बिना किसी पालनाघर में छोड़े, प्रयत्नपूर्वक उसके ठीक हो जाने तक उसकी सेवा-सुश्रुषा में उसके माता-पिता ने कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिये।


यदि उस असहाय बच्चे को आप मार्ग पर कहीं छोड़ रहे हैं तो यह अपने कर्तव्यों से पलायनवाद है। इस जन्म में आप यदि उसकी सेवा से मुँह मोड़ रहे हैं तो निश्चित मानिये कि कई जन्म-जन्मांतरों तक आपका वह कर्तव्य आपका पीछा नहीं छोड़ेगा। इसलिए परमात्मा ने जैसी भी संतान दी है, उसे उपहार मानकर उसकी सेवा कीजिये। भले ही इन बच्चों में मानसिक विकलांगता है तो भी ये स्नेह-प्रेम और वात्सल्य भरा आलिंगन समझते हैं, वे भी तरसते हैं कि कोई उन्हें अपनी ममताभरी बाँहों में भर ले। वात्सल्य पालनाघर के ऐसे ही बच्चों को नवजीवन प्रदान करने के लिए हमने वात्सल्य ग्राम, वृंदावन में विशेष बच्चों के स्कूलवैशिष्ट्यम् (आवासीय विद्यालय एवं पुनर्वास केन्द्र) की स्थापना की है। परमशक्ति पीठ का यह अनूठा मानवसेवी प्रकल्प उन नन्हें बच्चों के जीवन को एक नई दिशा देने के पूरे प्रयत्न करेगा जो किसी भी प्रकार की मानसिक या शारीरिक विकलांगता के शिकार हैं। इन बच्चों को अपना वात्सल्य बाँटते हुए मैंने हमेशा अनुभव किया है कि चाहे इनका मस्तिष्क पूरी तरह से कार्य नहीं कर पाता हो लेकिन इनकी भावनाएं भी हम सामान्य मनुष्यों जैसी ही होती हैं। थोड़ा सा श्रम करके इन्हें दिया गया प्रशिक्षण कम से कम इन्हें इस योग्य तो बना ही सकता है कि अपने दैनिक जीवन के कुछ कार्यों में इनकी अन्य लोगों पर निर्भरता थोड़ी कम हो जाये। वात्सल्य ग्राम स्थितवैशिष्ट्यम्में कुशल प्रशिक्षकों एवं सभी आवश्यक सुविधाओं के साथ ऐसे विशेष बच्चों को प्रशिक्षण देने का सत्प्रयास आरंभ किये जाने पर मुझे प्रसन्नता है। केवल वात्सल्य ग्राम के बच्चों ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रजप्रदेश के ऐसे विशेष बच्चों को यहाँ प्रवेश देकर उन्हें कुछ सीमा तक स्वावलंबी बनाने के प्रयत्न किए जाएंगे।

आभार - वात्सल्य निर्झर, अगस्त 2014

Wednesday, 16 July 2014

दिव्य और भव्य भारत का निमार्ण करो बेटियों

मातृशक्ति कितनी त्रसित है यह बात हम सब जानते हैं। किस तरह बेटियों के साथ बलात्कार करके उन्हें वृक्षों
पर लटकाकर नृशंसता का परिचय दिया जा रहा है, हम सब लोग देख रहे हैं। ऐसे निराशा भरे वातावरण के बीच भी हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि बेटियों का जीवन साहस से ओत-प्रोत हो इसी के लिये परमशक्ति पीठ द्वारा ‘बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर’ जैसा सुन्दर आयोजन प्रतिवर्ष किया जा रहा है। घोड़े पर सवार होकर द्रुत गति से घुड़सवारी करतीं, मार्शल आर्ट जैसी आत्मरक्षक कलाओं को सीखती और अवसर पड़े तो अग्निकुण्ड से कूदकर निकलने का अभ्यास करतीं नन्हीं बेटियों को देखकर लगता है कि आने वाले कल में इन पर बुरी नीयत रखने वालों के मन इनकी शक्ति के आभास से निश्चित ही काँप उठेंगे। कई बार हमारा समाज पत्थर की तरह जड़ हो जाता है जिसे जाग्रत करने की आवश्यकता होती है। मैं बेेटियों से हमेशा कहा करती हूँ कि कभी भी परिस्थिति में किसी के मुखापेक्षी मत बनो, अर्थात् अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के लिए किसी का मुख देखना या पूर्णरूपेण उस पर निर्भर हो जाना या फिर देवी-देवताओं की तरफ देखना, ठीक नहीं है। ‘देव-देव’ तो आलसी और अकर्मण्य ही पुकारा करते हैं। जब भी कभी देश की बेटी के परिचय की बात आती है तो उसकी जाति या बिरादरी उसका परिचय नहीं होती है। यदि बेटियों से उनका परिचय पूछा जाए तो वास्तव में उनका परिचय एक ही है कि:

मेरा परिचय इतना कि मैं भारत की तस्वीर हूँ
मातृभूमि पर मिटने वाले मतवालों की पीर हूँ
उन वीरों की दुहिता जो हँस-हँस झूला झूल गए
उन षेरों की माता हूँ, जो रण-प्रांगण में जूझ गए
मैं जीजा की अमर सहेली, पन्ना की प्रतिछाया हूँ
हाड़ी की हूँ अमिट निषानी, मैं जसवन्त की माया हूँ
कृष्णा के कुल की मर्यादा, लक्ष्मी की षमषीर हूँ
मेरा परिचय इतना कि मैं भारत की तस्वीर हूँ
हल्दीघाटी की रज का सिन्दूर लगाया करती हूँ
अरिषोणित की लाली से मैं पाँव रचाया करती हूँ
पद्मावत हूँ रतनसिंह की, चूड़ावत की सेनानी
मैं जौहर की भीड्ढण ज्वाला, रणचण्डी हूँ पाषाणी
माँ की ममता, नेह बहन का और पत्नी का धीर हूँ
मेरा परिचय इतना कि मैं भारत की तस्वीर हूँ
कालिदास का अमर काव्य हूँ, मैं तुलसी की रामायण
अमृतवाणी हूँ गीता की, घर-घर होता पारायण
मैं भूषण की शिवा बावनी, आल्हा का हुंकारा हूँ
सूरदास का मधुर गीत मैं, मीरा का इकतारा हूँ
वरदायी की अमर कथा हूँ, रण गर्जन गंभीर हूँ
मेरा परिचय इतना कि मैं भारत की तस्वीर हूँ

भारत की तस्वीर यानि क्या? जब हम माँ भारती का दर्शन करते हैं तो वहाँ मर्यादा है, वहाँ ज्ञान है, विज्ञान है, सुख-दुःख में अपने चित्त में समत्व को धारण करने की प्रेरणा है। तत्व की दृष्टि से सारे संसार में एक परमात्मा को अद्वैत भाव से दर्शन करने का वहाँ पर संस्कार है और व्यवहार जब आए तो अनासक्त भाव से अपने-पराए
के भेद बिना सबको तृप्त करने की अभिलाषा सदैव रखने की जहाँ परम्परा है। ये मर्म है हमारी संस्कृति का। हाँ, हमारे गुलामी के काल ने ज़रूर हमें हमारे स्वरूप से वंचित किया। बाल विवाह की प्रथा देश में प्रारंभ हुई। स्त्री को पर्दे में ढँका गया लेकिन उस काल की समाप्ति के बाद स्थितियाँ ये बनीं कि उसकी व्याकुलता हिमालय से भी ज्यादा ऊँची हो गई। मैं मानती हूँ कि घूँघट में कैद रखकर स्त्री की सारी क्षमताओं का गला घोंटा गया था। मुझे पता है कि घूँघट से बाहर आने की व्याकुलता कैसी होती है। लेकिन क्या उस व्याकुलता में सारे वस्त्र ही उतर जाएं? क्या स्त्री अपनी तथाकथित ऊँचाईयों को छूने के लिये निर्वस्त्र होकर फैशन परेड करती फिरे? तुम्हें क्या ज़रूरत है कि अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिये रात के बारह बजे तक नेताओं के बंगलों पर उनसे मिन्नतें करती रहो। अपनी महत्वाकांक्षाओं के पूर्ति के लिये अपने शील को न्यौछावर करती स्त्री शोभा नहीं देती। अगर स्त्री में मुक्त होने की बैचेनी थी तो उसमें से उसके असली स्वरूप का उदय होना चाहिये था, लेकिन उसने पश्चिमी जगत के तौर-तरीकों को अपना लिया। जो भारत की स्त्री है, उसका अपना एक गौरव है, उसकी अपनी एक गरिमा है और उस गरिमा के साथ जीना ही हमें वंदनीय बनाता है। मुझे एक बात कहनी है भारत की बेटियों से कि एक बार कौवे को बहुत तकलीफ हुई बगुले का गोरापन देखकर। उसे लगा कि मेरे कालेपन की सारी दुनिया निंदा करती है इसलिये मुझे गोरा होना चाहिये, बगुले जैसा। यह सोचकर वह नदी किनारे गया और अपने शरीर को पत्थर से घिसने लगा। गोरा होने के चक्कर में यह सब करते हुए वह लहूलुहान हो गया, उसके पंख तक बिखर गए। एक स्थिति ऐसी भी आई जब वह मृत्यु के आलिंगन में चला गया। क्यों हुई उसकी ऐसी दशा? क्योंकि उसे अपने स्वरूप पर, अपने अस्तित्व पर गौरव नहीं था। अपने स्वरूप से असंतुष्ट कौवा, बगुले जैसा होना चाहता था लेकिन हुआ क्या? उसे अपने प्राणों से ही हाथ धोने पड़ गए।

जब हम किसी दूसरे का अंधानुकरण करते हैं तब हम कहीं न कहीं अपने अस्तित्व के हंता बनकर उसकी हत्या कर बैठते हैं। इसलिये पश्चिम के जगत की जो समस्याएं हैं उनके समाधान उनके पास होंगे लेकिन हमारी समस्याओं के समाधान हमें खुद तलाशने हांेगे। आज भारत की नारी जिस दौर से गुजर रही है, देश जिस दौर से गुजर रहा है, जहाँ पर बलात्कार की घटना को ‘लड़कों की गलती’ माना जा रहा है, स्त्री-पुरुष के बीच यह पक्षपातपूर्ण रवैया अत्यन्त खेदजनक है। मैंने बरसों पहले दुर्गावाहिनी के माध्यम से देश की मातृशक्ति को वंदनीय बनाने का कार्य अपनी तमाम बहनों के साथ किया था लेकिन आज क्या स्थिति है। नारी पर अत्याचार तो हो रहें हैं लेकिन कहीं-कहीं स्त्री का आचरण भी इसके लिए जिम्मेदार है। वास्तव में हम अपने आचरण से ही वंदनीय और निंदनीय होते हैं। बेटियाँ ऐसा आचरण नहीं करें कि जिसके फलस्वरूप माँ-बाप को कभी यह कहना पड़े कि तू पैदा होने से पहले मर जाती तो अच्छा था क्योंकि तुम बाप को सीना तानकर चलने का अवसर दे सकती हो लेकिन तुम्हारा ही आचरण कई बार उन्हें शर्मसार करके जीवन भर गर्दन नीची करके चलने और जीते-जी मर जाने के लिये विवश भी करता है। इसलिए जगत के आकर्षणों में रहकर भी अपने शील और मर्यादा को बनाए रखो भारतमाता की बेटियों। हमेशा यह मानकर चलो कि अपने स्वरूप में विराजमान रहना ही हमारी गरिमा है। हम प्रतिवर्ष वात्सल्य ग्राम, वृंदावन में आयोजित होने वाले ‘बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर’ में देश भर से आई बेटियों को शारीरिक और बौद्धिक रूप से सक्षम बनाने का प्रयत्न इसलिये नहीं करते कि वे किसी पर अत्याचार करें, बल्कि यह प्रशिक्षण उनके अपने बौद्धिक स्तर को विकसित करने और संकट के दौरान आत्मरक्षा की विभिन्न कलाओं का उपयोग कर स्वयं के शील की रक्षा करने के लिये प्रदान किया जाता है। हम उन्हें यह सिखाते हैं कि यदि कोई तुम पर अत्याचार करे तो तुम उसे चुपचाप झेलो नहीं। क्योंकि अत्याचारी जितना पापी है, उसे सहन करने वाला भी उसमें सहभागी होने का पापी है क्योंकि उसे चुपचाप सहना यानि उसे बढ़ावा देना है। बेटियाँ सीना तानकर हर विपति के आगे खड़ी हो सकें, उनके यह भाव प्रबल हो कि वे ‘अबला’ नहीं बल्कि ‘सबला’ हैं। प्राचीन काल की जो महिलाएं होती थीं, उनको आठ-नौ बच्चे होते थे। अपनी दिनचर्या निपटाते हुए उन बच्चों का लालन-पालन करना, गृहकार्य के बाद खेतों में काम करना, कुएं से पानी भरना जैसे अनेक कार्य वो करती थीं, वो किसी एक प्रेमी की प्रेमिका या किसी एक पति की पत्नी भर ही नहीं होती थीं बल्कि वो चाची, ताई, बुआ, मौसी, भाभी बनकर जाने कितने रिश्तों को निभातीं थीं। उस समय की वो एक स्त्री अपनी विभिन्न भूमिकाओं में पूरे कुटुम्ब को तृप्त करती थी। अद्भुत दृश्य होता था उस समय के परिवारों में, स्त्री की उस भूमिका का। चेहरों की रौनक देखते बनती थी। पापियों को दुत्कारने में वह स्त्री सिंहनी बन जाती थी क्योंकि गृहस्थ आश्रम की उस कठिन तपस्या में उसके भीतर गजब का आत्मबल पैदा हो जाया करता था। वह वत्सला भाव से अपनी संतानों का लालन-पालन करती थी। सोच सकते हो आप, नौ महीनों तक बच्चे को गर्भ में रखना, उसे जन्म देना, रात-रात भर जागकर अपने बच्चों की देखभाल करना, यह सब उस समय की स्त्री बिना किसी झल्लाहट के किया करती थी। क्या कोई पिता केवल एक रात के लिए जाग सकता है अपने बच्चे के पालन में? ईश्वर ने जितना सामथ्र्य और धैर्य स्त्री को दिया है, उतना पुरुष को नहीं। ईश्वर की यह देन अद्भुत है। लेकिन मेरा निवेदन है बेटियों, कि पुरुष बनने की होड़ में तुम ईश्वर के इस उपहार को खो मत देना। तुम पुरुष की काॅर्बन काॅपी नहीं हो। तुम स्त्री हो। पुरुष यदि अहंकार के केन्द्र में खड़ा है बेटियों, तो तुम प्रेम की धुरी बनना क्योंकि अभिमान का शिखर तभी झुकेगा जब तुम्हारा समर्पण गहरा होगा।

तुम समर्पण कर सकती हो, तुम अर्पित हो सकती हो। तुम्हें अपनी सार्थकता को सिद्ध करना है बेटियों, क्योंकि आज तो स्त्री का ममत्व भी कहीं खोता जा रहा है। जब कैरियर बनता है ना तुम्हारा, जब पाॅकेट में मनी आती है ना, तुम बहुत सी बेटियाँ अपने पिता तक से भी ठीक से बात नहीं करती हैं। जिस ‘अर्थ’ के दम पर तुम अभिमान से फूल जाती हो ना, वही कभी-कभी ‘अनर्थ’ का कारण भी बन जाता है। फिर तुम ‘अर्थ’ के अर्थ को तो समझती हो लेकिन रिश्तों के अर्थ को भूल जाती हो। इसलिए अर्थ वो नहीं जो अनर्थ करवाए। अर्थ वो जो धर्म पर स्थित करके संस्कार के पथ पर प्रशस्त करे। वो अर्थ शुचिता से भरा होना चाहिए, इसलिए शुचिता वह नहीं जो शील बेचकर प्राप्त की जाए। सफलता से ज्यादा बढ़कर सार्थकता का महत्व है। तुम एकाकी जीवन को भी सार्थकता से जी सकती हो। यदि आप शुद्ध मन से कार्य करते हो तो आनन्द छाया की तरह आपके पीछे-पीछे मंडराता है। मैं ऐसा ही दृश्य देखती हूँ उन शिक्षिकाओं के चेहरे पर जो बेटियों को सुसंस्कार देने में दिन-रात संलग्न हैं। शुद्ध मन से कार्य करते हुए उनके भीतर उस संतोष का जन्म होता है जो लाखों रूपये खर्च करके भी नहीं पाया जा सकता। 

वात्सल्य ग्राम के बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर के समापन समारोह में मैंने देखा कि मात्र दस दिनों के शिविर में शिक्षिकाओं ने अपना पसीना बहाकर जिस लगन के साथ बेटियों को व्यक्तित्व विकास की जिन कलाओं से रूबरू करवाया, वह असाधारण था। मानों केवल दस दिनों में उन्हें दस-बीस वर्ष की शिक्षा मिल गई हो। इतनी भयंकर गर्मी के बीच रहकर कठिन अभ्यासों के बीच दक्षता को पाना सहज न था। लेकिन शिक्षिकाओं की मेहनत और प्रशिक्षणार्थी बेटियों की लगन ने कमाल कर दिखाया। मैं देख रही थी कि समापन समारोह में बैठे तमाम लोग गर्मी से परेशान दिख रहे थे लेकिन वह गर्मी अपनी विभिन्न कलाओं का प्रदर्शन करती बेटियों पर कोई असर करती नहीं दिख रहा था। क्यों हुआ ऐसा? सीधी बात है कि यदि मन की लगन गहरी है तो फिर कोई भी विपरीत परिस्थिति शरीर या मन को प्रभावित नहीं कर सकती। यही है इन्द्रियों को साधकर आगे बढ़ने की कला।

यदि मन में उत्साह है तो फिर जीवन की प्रत्येक राह आसान हो जाती है, लेकिन उत्साह तभी आता है जब
हमारी राह शुचितापूर्ण हो। हमारा उत्साह तब संकल्प बनता है जब हम सब कुछ संभव मान लें। सूरत की एक प्रशिक्षणार्थी बेटी ने कहा कि ”अरे मुझे यहाँ आकर लगा कि मैं तो सब कुछ कर सकती हूँ।“ लेकिन मैं कहना चाहती हूँ बेटियों कि करना वो जो भारत को वन्दनीय बनाए। क्यांेकि देश भूमि से नहीं बल्कि हम लोगों की भूमिका से महानता के शिखरों को छूता है। हमें विचार करना होगा कि हमारी भूमिका देश को वन्दनीय बनाती है या निन्दनीय बनाती है। इस शिविर में भाग लेने आई बेटियों के माता-पिता को मैं वन्दन करती हूँ, जिन्होंने वात्सल्य पर भरोसा करके उनको यहाँ भेजा। मैं जानती हूँ कि आप सब अपने घरों में लाडो रानी बनकर रहती हो लेकिन यहाँ तो प्रातः चार बजे जागना और दिन भर परिश्रम करके रात ग्यारह बजे सोना होता था। आज आप सब बेटियों का विश्वास देखकर मुझे लग रहा है कि भले ही आपके माता-पिता ने स्वर्ण बनाकर आपको दस दिन पहले हमें सौंपा था लेकिन इस शिविर के माध्यम से आज हम आप सब बेटियों को कुन्दन बनाकर उन्हें सौंप रहे हैं। आपने अपने कठिन परिश्रम से इस बात का गौरव करने का अवसर मुझे प्रदान किया है। आप जहाँ भी रहो, वात्सल्य के इस प्रशिक्षण से अपने गौरव को स्थापित करो बेटियों, यह मेरा आशीर्वाद है। अभी थोड़े दिनों पहले भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई से मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझसे पूछा कि -‘दीदी माँ, आपको कैसा लग रहा है यह राजनैतिक परिवर्तन?’ मैंने कहा -‘नरेन्द्रभाई, ऐसा लग रहा है जैसे बरसों-बरस से नागपाश में जकड़ा यह देश अब मुक्त हो गया हो। आप भव्य भारत का निर्माण कीजिए, मेरे देश की बेटियाँ उसे दिव्यता प्रदान करेंगी।’ बेटियों, देश के नवनिर्माण में आपकी सक्रिय और सार्थक भूमिका हो, यह मेरा सपना है। आपके सुन्दर भावों को देखकर आज लग रहा है कि मेरा यह सपना ज़रूर पूर्ण होगा। भव्यता और दिव्यता दोनों के मिलन से हमारा यह देश शिखर पर पहुँचकर सारी दुनिया का मार्गदर्शन करेगा। उन्नति के शिखरों पर पहुँचकर भी विनम्रतापूर्वक झुकने का भाव जिस दिन हमारे भीतर होगा, निःसन्देह उस दिन हम विश्वगुरु होंगे। मुझे विश्वास है बेटियों कि भारत को विश्व का चहेता बनाने वाली संतानें तुमसे ही उत्पन्न होंगी। अपने कृतित्वों से वह सब करो, जिसके कारण करोड़ों भारतवासियों के मस्तक गर्व से ऊँचे हो सकें।

-  दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
साभार - वात्सल्य निर्झर, जुलाई २०१४  अंक

Saturday, 7 June 2014

स्वावलंबी पैरों पर खड़ी होती जिंदगी

उत्तराखंड में प्रकृति की मार से तबाह हो गए सुदूर पहाड़ी गाँवों को फिर से बसने में परमशक्ति पीठ अपनी यथासंभव सहायता लगातार वहाँ पहुँचा रहा है। इन पहाड़ी ग्रामवासियों की विशेषता है कि वे अपने पारंपरिक व्यवसायों के माध्यम से ही अपना जीविकोपार्जन करते हैं। इनमें गौ पालन प्रमुख है। पिछले वर्ष की प्राकृतिक आपदा में बड़ी संख्या में इनके मवेशी मारे गए जिसके बाद लोगों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही था कि वे अब अपनी जीविका के लिए क्या करेंगे? दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी की पावन प्रेरणा ने परमशक्ति पीठ को पर्वतवासियों की सहायता के मार्ग पर प्रशस्त किया। सहयोग के हाथ उठे और संस्था की ओर से ऐसे परिवारों को एक-एक गाय निःशुल्क वितरित की गई है जिसके माध्यम से वे घी आदि दुग्ध उत्पाद बनाकर उसको बेचने के बाद हुई आय से अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। कुछ घरों में उम्मीद की रोशनी टिमटिमा उठी है। विश्वास है कि देश के उदारमना बंधुओं का सहयोग परमशक्ति पीठ के इस ‘गौदान अभियान’ को गति प्रदान कर सकेगा।

    परमात्मा ने जीवन को एक अद्भुत क्षमता दी है और वह यह है कि लाख प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी वो निरन्तर आगे बढ़ने की कोशिशें करता है। बिलकुल वैसे ही जैसे एक पहाड़ी नदी तमाम अवरोधों के बाद भी निरन्तर आगे बढ़ती रहती है। पिछले साल उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा ने जैसे वहाँ जिंदगी को स्तब्ध कर दिया था लेकिन जिजीविषा ने कुछ ही दिनों में इस स्तब्धता को तोड़ दिया। वीरान होकर सिसक रहे दुर्गम पहाड़ी गाँवों की ओर कुछ वे साहसी कदम उठे, जिनका मन वहाँ की तबाही से आहत था, जो अपने मानव होने की सार्थकता को सिद्ध करना चाहते थे, सिसक रही मनुष्यता को ममत्व भरा सहारा देकर।

    दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी उन्हीं चंद व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने उस त्रासदी को अन्तर्मन की गहराईयों तक अनुभव किया और अपनी संस्था ‘परमशक्ति पीठ’ के माध्यम से हिमालय की गोद में बसे उन गाँवों तक हरसंभव सहायता पहुँचाने का संकल्प लिया, प्रकृति के तांडव ने जिन्हें तोड़कर रख दिया था। राहत सामग्री वितरण इस क्रम की पहली आवश्यकता थी। लेकिन क्या उनके पुनर्वास के लिए बस यही कदम कारगर है? इस प्रश्न का उत्तर वात्सल्य की धारा में निरन्तर उठ रहे चिंतन के भँवर से निकला। दीदी माँ जी ने संस्था के कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया कि प्रभावित ग्रामवासियों को सहायता सामग्री वितरण के बाद वे इस बात के प्रयास करें कि ‘वात्सल्य स्वावलंबन प्रशिक्षण केन्द्रों’ के माध्यम से  प्रशिक्षित होने के बाद ग्रामवासियों को स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें। क्योंकि कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाये तो परिश्रमपूर्वक कर्म करके अपना जीविकोपार्जन करना मानव की सहज वृति है।

    आपदा प्रभावित उत्तराखंड प्रवास के दौरान मुझे एक पहाड़ी गाँव में जाते हुए पगडंडी पर एक पैंसठ वर्षीया बुजुर्ग महिला मिली जो अपनी पीठ पर घास-पत्तों का भारी बोझ बांधे हुए थी। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि इस बोझे में कुछ जंगली वनस्पितयाँ हैं जिनको खाने पर गाय अत्याधिक पौष्टिक दूध देती है और उससे जो घी बनाया जाता है वह औषधीय गुणों से युक्त होता है। इस प्रकार से वह प्रतिदिन कठोर श्रम करके घाटी में जाकर अपने मवेशियों के लिए चारा इकट्ठा करती है और फिर उनसे प्राप्त दूध से बनाये गए घी को निकटवर्ती शहरों में बेचती है। हाड़तोड परिश्रम के बाद बनाया गया घी ही उनकी जीविका का एकमात्र साधन है। पिछले वर्ष केदारघाटी में हुई भयानक तबाही अपने साथ इनके उन मवेशियों को भी बहा ले गई, जिनके सहारे जीवन चलता था। कितनी बड़ी विडम्बना है कि समाज का यह पहाड़ी वर्ग जो लोगों के लिए पौष्टिक दुग्धोत्पाद  बनाता हो, वह रूखे-सूखे भोजन को भी तरस जाये।

    बहरहाल, दीदी माँ जी के करुणामयी मार्गदर्शन में परमशक्ति पीठ ने संकल्प लिया कि दूरदराज पहाड़ी गाँवों के उन परिवारों को निःशुल्क दुधारू गायों का वितरण किया जाये जिनके पास उसके अतिरिक्त गुजारे का और कोई साधन नहीं है। कार्ययोजना साकार हुई और आज कुछेक परिवार इस बात से खुश हैं कि इन गायों के माध्यम से वे भले ही थोड़ी, लेकिन स्वाभिमानपूर्ण आय से अपना गुजर-बसर कर सकेंगे। इस नन्हें प्रयत्न को यदि समाज का व्यापक सहयोग मिले तो न जाने कितने पहाड़ी परिवारों में फैला अभावों का अंधकार दूर हो सकेगा।   
- देवेन्द्र शुक्ल 

    ‘हमारे देश में इन दिनों अभावग्रस्तों को अनेक प्रकार की सुविधाएं देने की होड़ सी मची है। नाममात्र के शुल्क पर खाद्यान्न सामग्री देकर भूखी जिंदगियों को बचाना अच्छी बात है लेकिन यदि उन्हें जल्दी ही स्वाभिमानपूर्वक स्वरोजगार की जमीन पर नहीं खड़ा किया गया तो फिर वो जिंदगियाँ परिश्रम के पथ से हटकर आलसी हो सकती हैं, जिनके जीने का फिर कोई अर्थ नहीं रह जायेगा। कितना अच्छा हो यदि हम उन्हें भोजन और आश्रय की तात्कालिक व्यवस्था उपलब्ध कराने के साथ ही इस बात पर भी ध्यान दें कि कैसे उन्हें छोटे-मोटे व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किये जाएं ताकि वे अपने श्रम के दम पर अपना जीविकोपार्जन स्वयं कर सकें। किसी को रोटी खिलाना उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि उसे रोटी के लिए धन कमाने लायक बनाना। परमशक्ति पीठ के माध्यम से हम आपदा प्रभावित उत्तराखंड की केदारघाटी में उन संभावनाओं को तलाशकर उन पर काम शुरू कर चुके हैं, जो वहाँ के निवासियों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराती हों। देश-विदेश के जो बंधु-भगिनियाँ हमारे से पुण्यकार्य से जुड़कर हमारा सहयोग कर रहे हैं, संस्था उनकी आभारी है। विश्वास है कि हमारे नन्हें प्रयास एक दिन जरूर विराट रूप धारणकर शेष समाज की प्रेरणा बन सकेंगे’ 

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
साभार - वात्सल्य निर्झर, अप्रैल 2014

Thursday, 22 May 2014

परमशक्ति पीठ के तत्वाधान में अखिल भारतीय बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर - 2014

दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाते हुए हमारा देश भारत आज तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रसन्नता की बात है कि हमारी बेटियाँ भी आज समाज एवं व्यवसाय के क्षेत्र में बेटों की बराबरी की स्थिति में हैं, लेकिन उनकी इस उन्नति पर कहीं न कहीं अपसंस्कृति की छाया भी दिखलाई देती है। शिक्षा के क्षेत्र में हम चाहे जितनी ऊँचाईयों को छू लें परन्तु यदि हम नैतिक मूल्यों से दूर हैं तो फिर निश्चित मानिये कि तमाम सारी भौतिक सुख-सुविधाओं को पाकर भी हम आत्मिक सुख नहीं पा सकते है, जो कि जीवन का सच्चा आनन्द है।

    वात्सल्यमूर्ति परमपूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी का मानना है कि बेटियों के संस्कार ही एक श्रेष्ठ परिवार और समाज का निर्माण करने की शक्ति रखते हैं। उन्हें किशोरवस्था से ही इस बात का प्रशिक्षण मिलना चाहिए कि कैसे एक स्वस्थ समाज का निर्माण किया जा सकता है। उनके इसी विचार के दृष्टिगत परमशक्ति पीठ द्वारा प्रतिवर्ष वात्सल्य ग्राम, वृन्दावन में ‘अखिल भारतीय बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर’ का आयोजन किया जाता है। बेटियाँ अपनी श्रेष्ठतम् मानसिक एवं शारीरिक दक्षता को कैसे प्राप्त कर सकें, इस आवासीय शिविर में उन्हीं इस कला से परिचित करवाया जाता है।

    ज्ञान-विज्ञान, कला, आध्यात्म एवं शारीरिक दृढ़ता बढ़ाने वाले अनेक पाठ्यक्रमों से युक्त इस प्रशिक्षण शिविर में विगत कई वर्षों में सम्मिलित होने वाली सैकड़ों बेटियों ने अपने जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन अनुभव कर अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता पाई है। 17 से 30 वर्ष तक आयु की कोई भी बेटी इस शिविर में भाग ले सकती है। इच्छुक प्रशिक्षणार्थी शिविर हेतु निर्धारित शुल्क रुपये 1500/- की राशि बैंक ड्राफ्ट या चेक द्वारा परमशक्ति पीठ, वात्सल्य ग्राम को भेज सकते हैं।

नोट: बैंक ड्राफट, चेक अथवा मनीआॅर्डर केवल ‘परमशक्ति पीठ’ के नाम से ही भेजें।
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें:
साध्वी स्वरूप जी
मोबाइल: 9412777154, 88268 88002
दूरभाष: 0565 2456888